स्वच्छ भारत अभियान: 3 साल, करोड़ों का बजट हालत जस की तस

Swach Bharat Abhiyan
2  साल में कैसे बनेंगे 80 लाख शौचालय
2 अक्टूबर 2014 को शुरू किये गये अभियान ‘स्वच्छ भारत’ को आज पुरे 3 वर्ष पूरे हो गए है लेकिन  स्थिति जैसे वहीं पर है जहां से शुरुआत हुई थी। स्वच्छ भारत अभियान का मुख्य उद्देश्य था कि वर्ष 2019 तक, महात्मा गांधी के जन्म की 150 वी वर्षगांठ तक भारत के लगभग सभी ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में शौच मुक्त बनाया जाए। हर राज्य में इसको लेकर अभियान चलाए गए तथा लोगों को स्वच्छता के प्रति उनको जागरूक किया गया। यहां तक कि स्वयं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झाड़ू लगाकर इसकी शुरुआत की थी। स्वच्छता अभियान को साकार करने के लिए 1.96 लाख करोड़ रुपये का अनुमादित लागत बनाया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करना था। 2014 से अब तक 40 लाख शौचालयों का निर्माण कराया जा चुका है। सरकार ने 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) भारत को हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
नमामि गंगे प्रोजेक्ट को मिले 20,000 करोड़, गंगा की हालत जस की तस 
सरकार का कहना था कि नमामि गंगे के तहत गंगा नदी के किनारे स्थित 118 शहरी निवास स्थलों पर सीवरेज की स्थापना होगी और 2022 तक देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों को सुरक्षित पेयजल की सुविधा उपलब्ध की योजना होगी। लागत की बात करें तो सरकार द्वारा यह घोषणा की गयी है कि स्वच्छ भारत मिशन के लिए 9000 करोड़ वर्ष 2016-17 के लिए अनुमति किया गया है पर इस वर्ष 2017 में इसे बढ़ाकर 20,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। नमामि गंगे प्रोजेक्ट के चलते भी गंगा सफाई अभियान की शुरुआत की गई थी जिसमें बात हुई थी कि शहरों का कचरा अब सीधे नदियों में नहीं गिराया जाएगा और 2022 तक स्वच्छ पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
औद्योगिक कचरा, शवों को बहाने की परम्परा पर नहीं लगी रोक 
 2,525 किमी. दायरे में बहने वाली गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड से होकर गुजरती है और प्रदूषित गंगा के इलाकों में वाराणसी, कानपुर, मथुरा और पटना मुख्य सूची पर है। कानपुर और मेरठ जैसे शहर औद्योगिक नगरी में आते हैं जिसका औद्योगिक कचरा सीधे गंगा नदी में गिराया जाता है और यह निरन्तर जारी है। अध्यात्म की नगरी कही जाने वाली वाराणसी शवों को बहाने की परम्परा को आज भी मना रही है और शवों का बहाया जाना गंगा को प्रदूषित करने का एक मुख्य कारण है। इसके लिए नियम बनाए गए कि शवों को बहाने के बजाय जलाने की व्यवस्था हो। इन 3 सालों में 1114.75 कि.मी. ही सीवर लाइनों का ही निर्माण हो सका है जबकि आंकड़ा 4031.41 का था।