मैं दुनिया के हर कोने में रेडियो करना चाहूंगी: RJ Jassi

आज के दौर में संगीत हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया है लेकिन कभी-कभी हम चाहते है कि गाने के साथ-साथ हमें कुछ खबरें सरल शब्दों में मिल जाएं, कुछ जोक भी हम सुनकर खिलखिला लें, किसी को अपनी बातें बता दे और किसी कि सलाह को सुन लें। हम कुछ ऐसा सुनना चाहते है जो हमें शांति प्रदान करें ऐसे में सबसे पहला ख्याल हमारे मन में कुछ आता है तो वह एफएम रेडियो है जिसके माध्यम से हमें गीत के साथ-साथ समाचार और कुछ चुटकुले भी सुनने को मिल जातें है, जो हमें ख़ुशी कि अनुभूति कराते है। तमाम तकनीक आने के बाद भी एफएम रेडियो का श्रोताओं के बीच में अपना अलग महत्व है। 13 फरवरी को विश्व रेडियो डे रूप में मनाया जाता है। एफएम रेडियो की दुनिया में अपनी आवाज, अपनी बातों से अलग पहचान बनाने वाली आरजे जस्सी से न्यूज़ स्टैंडर्ड ने ख़ास बातचीत की। आरजे जस्सी ने रेडियो और अपने जीवन से जुड़ें कुछ पहलुओं पर बातचीत की। पेश है ख़ास बातचीत के प्रमुख अंश-

Radio Jockey Jassi

जसप्रीत ढिल्लों से आरजे जस्सी बनने की शुरुआत कैसे हुई?

मैंने कभी भी आरजे बनने का निश्चय नहीं किया था। मुझे बचपन से ही अपनी आवाज बिलकुल पसंद नहीं थी। मैं अपनी आवाज से नफरत करती थी। स्कूल में लड़के मुझे चिढ़ाते थे क्योंकि मेरी आवाज भारी थी। मैं घर पर आकर रोती थी और चाहती थी कि मेरी आवाज पतली हो जाएं। स्कूल के बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता कि पढाई कर रही थी। जब कॉलेज खत्म हुआ तो मैंने सोचा कि एडवरटाइजिंग एजेंसी या रेडियो में इंटर्नशिप कर लेंगे क्योंकि पढाई के दौरान मैंने ये सब पढ़ा था। उस वक़्त तक न मैंने किसी आरजे को सुना था और न मुझे पता था कि आरजे कौन होते है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं आवाज का काम करुँगी। मैं स्नातकोत्तर नहीं करना चाहती थी क्योंकि मुझे ब्रेक चाहिए था। मैं रेडियो वन में इंटर्नशिप लेने गयी क्योंकि मुझे घर पर नहीं बैठना था। जब मैंने इंटर्न के तौर पर रेडियो में काम करना शुरू किया तो मुझे रेडियो बहुत अच्छा लगने लगा। मैंने वहीं ट्रेनी के तौर पर 8 महीने काम किया। उसके बाद मुझे रेडियो मिर्ची में आरजे के तौर पर नौकरी मिली।

आपके लिए एफएम रेडियो क्या है?

मेरे लिए रेडियो बहुत ही महत्वपूर्ण और खूबसूरत माध्यम है।आज का दौर बहुत बदल चूका है। लोग अब अख़बार पढ़ना पसंद नहीं करते वो ऐप पर ही समाचार पढ़ लेते है। ह्यूमन टच आज कल बहुत काम हो गया है। इंसान की इंसान से बातचीत नहीं होती। रेडियो एकलौता ऐसा माध्यम है जहाँ इंसान का इंसान से सीधा सम्पर्क है चाहे वो सूचनाओं का आदान प्रदान हो या मनोरंजन हो, या शांति ढूढ़ने की बात हो रेडियो एक शानदार माध्यम है। जब आप किसी वेबसाइट को पढ़ रहे होते है या किसी अख़बार को आप किसी इंसान से संपर्क में नहीं होते लेकिन रेडियो ऐसा माध्यम है जहाँ आप इंसान के साथ संपर्क में होते।

एफएम रेडियो से जुड़ा कोई सुनहरा किस्सा आप हमारे साथ साझा करना चाहयेंगी?

रेडियो एफएम पर तो बहुत सारे किस्से है लेकिन मुझे वो किस्से सबसे ज्यादा प्रिय है जिसमे हमने रेडियो के माध्यम से कोई बदलाव लाया हो। अभी हल में ही वर्ल्ड एड्स डे के दिन चार एचआईवी पॉजिटिव लड़कियाँ जिनके माता पिता नहीं है, उनके लिए हमने रेडियो के माध्यम से उनके लिए बहुत सारे पैसे इकट्ठा किये थे। जिससे वो चारों लड़कियाँ पढ़ पाएंगी। सामाजिक अभियान शुरू से ही मुझे पसंद रहे है क्योंकि इनसे आपको रेडियो की ताकत का पता चलता है।

श्रोताओं को अपनी आवाज पसंद करवाना आरजे के लिए कितना चुनौतिपूर्ण होता है? आप अपनी आवाज को फिट रखना के लिए क्या नुस्खे फॉलो करती है?

मुझे काफी देर से अनुभव हुआ कि मेरी आवाज बहुत अच्छी है। आरजे के तौर पर हमे अपनी आवाज का ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि श्रोता सबसे पहले आपकी आवाज को सुनेंगे लेकिन आपकी आवाज बहुत अच्छी है और आप जो बोल रहे हो उसका कोई मतलब नहीं है तो लोग थोड़ी देर बाद ऊब जायेंगे। आवाज के साथ-साथ अच्छे कंटेंट का होना बेहद जरूरी है। मैं अपनी आवाज का थोड़ा बहुत ध्यान रखती हूँ। मैंने पिछले कई सालों से फ्रीज का पानी नहीं पिया, मैं थोड़ा बहुत रियाज भी करती हूँ और योगा कर लेती हूँ। मैं विशेष रूप से अपनी आवाज के लिए कुछ नहीं करती हूँ।

आपके पसंदीदा आरजे कौन है और क्यों?

मेरे पसंदीदा रेडियो जॉकी नावेद है। जब मैं रेडियो में नयी-नयी थी तो सबसे पहले मैंने नावेद के शो पर काम किया था। नावेद बिना प्रयास के बहुत अच्छा रेडियो करते है। वो इतने आराम से रेडियो करते है कि ऐसा लगता है जैसे उनके मन से सब कुछ आ रहा है। मैंने उनसे जो सीखा है वो मेरे साथ है। मुझे रियल आरजे पसंद है। जो लोग बनवटी बोलते है वो मुझे इतना पसंद नहीं है। मेरे लिए आप जितना रियल है उतने बड़े आप आरजे है।

बैंगलोर जाने का निश्चय अपने क्यों किया? बैंगलोर मैं आपके कैसे अनुभव रहे?

मैंने यह महसूस किया कि मेरे ऊपर अभी ज्यादा जिम्मेदारियां नहीं है और मैं शहर बदल सकती हूँ। मेरा यह मानना है कि मैं जितना ज्यादा अनुभव लुंगी उतनी बेहतर रेडियो जॉकी बनूँगी। मैंने बैंगलोर आकर बहुत कुछ सीखा है। अकेले रहना, नयी भाषा के लोगों से बात करना उनकी संस्कृति समझना। इन सब से आप बहुत प्रशिक्षित हो जाते है ऐसा मेरा मानना है। जब मैं बैंगलोर आयी तो मुझे  डर था कि मैंने नए शहर में नौकरी ली है और यहाँ के लोगों ने मुझे पसंद नहीं किया तो कैसे चलेगा। धीरे-धीरे मैंने यह सोचना ही छोड़ दिया कि मैं नार्थ इंडिया कि हूँ या बाहरी हूँ। शुरूआत के 2-3 महीने मुझे बहुत संघर्ष करना पड़ा, मुझे समझ नहीं आता था कि मैं किस तरह का कंटेंट करूँ और क्या बोलूं। मैं दिल्ली में आसानी से बोल सकती थी कि डीएनडी पर जाम है लेकिन यहाँ मुझे सड़कों के नाम तक नहीं पता थे। मैं अपने आप को बहुत अकेली समझ रही थी। उसके बाद मैंने अपने आपको वैश्विक नागरिक मानना शुरू कर दिया और अपने आप को इतना तैयार कर लिया कि मुझे दुनिया के किसी कोने में जाकर भी रेडियो करना पड़ें तो मैं वो भी कर सकती हूँ।

आप अपने शो ज़रा सी लाइफ पर श्रोताओं को मोटीवेट करने का काम करती है। शो के कंटेंट का चयन आप कैसे करती है?

रेडियो एक कला की तरह है जैसे पेंटिंग होती है। एक अच्छी पेंटिंग तब बनती है जब आप वो बनाते है जो आप महसूस करते है। मैं भी अपने आसपास के लोगों से बात करती हूँ उन्हें देखती हूँ क्योंकि एक आरजे जितनी बारीकी से चीजों को देखता है उतनी जल्दी उसे कंटेंट को आईडिया मिलता है। मैं अपने कंटेंट का आईडिया अख़बार या पत्रिका से नहीं लेती। मैं यह नहीं सोचती की ट्विटर में ये आया है तो इसके बारें में बात करूँ। मैं यह सोचती हूँ की जब कोई इंसान दफ्तर से घर जायेगा तो खाली समय में वो क्या सोचेगा। क्या चीज उसे परेशान करेगी? क्या चीज वो सुनना चाहयेगा? क्या चीज उसे हेल्प करेगी? मैं अपना कंटेंट लोगों को देखकर उनसे बातचीत करके तैयार करती हूँ।

ज़रा सी लाइफ को श्रोताओं द्वारा कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है?

जब मैं बैंगलोर आ रही थी तो मैं बहुत डरी हुई थी क्योंकि मैंने 7 साल दिल्ली में रेडियो किया था और मैं वह की मार्किट को अच्छे से जानती थी। अक्सर आप देखेंगे तो रेडियो जॉकी लोकल होते है वो वहीं सालों साल वहीं रेडियो करते है जहाँ वो रहते है। कोई ऐसा कदम उठता नहीं है कि नार्थ इंडिया से साउथ इंडिया जाने का फैसला करे। मुझे अपने व्यक्तित्व के हिसाब से लगता था कि मुझे एक्सपेरिमेंट करना चाहिए। जब मैं बैंगलोर आयी तो मैं थोड़ा परेशान थी क्योंकि यहाँ के लोगों कि भाषा और संस्कृति अलग है। मैं सोचती थी कि कैसे में यहाँ के लोगों को खुश करुँगी? कैसे ये लोग मेरी आवाज को पसंद करेंगे? ज़रा सी लाइफ के बाद मुझे एहसास हो गया कि जो कंटेंट है और जो भावनाएं है वो भाषा और संस्कृति से बढ़ कर है। ज़रा सी लाइफ को श्रोताओं कि बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा है।

भविष्य में आपकी क्या योजनाएं है? रेडियो पर आप क्या नया करने वाली है?

एफएम रेडियो पर तो बहुत सारे एक्सपेरिमेंट होते रहे है और होते रहेंगे। मैं सामाजिक अभियान करना चाहूंगी क्योंकि मुझे यह लगता है कि रेडियो को अभी बहुत निचोड़ना बाकि है। भारत में रेडियो को अभी भी बहुत से लोग सिर्फ मनोरंजन के तौर पर देखते है। मैं यह चाहती हूँ कि मेरे शो में सामाजिक अभियान हो जिससे समाज का भी भला हो सकें। जिससे लोगों को यह पता चल सकें कि रेडियो सिर्फ गाने सुनने कि जगह नहीं है यह पर और भी बहुत कुछ हो सकता है।

ashish@newsstandard.in

 

Web Title: I would like to do radio in every corner of the world, says RJ Jassi

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