CBSE ने टाइप-1 डायबिटीज वाले छात्रों को विकलांग व्यक्तियों की श्रेणी में किया शामिल..

CBSE announced that children with Type1 diabetes will now be placed under the category of persons with disabilities

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने हाल ही में घोषणा की है कि टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों को अब पर्सन विथ डिसेबिलिटी (पीडब्ल्यूडी) यानी विकलांग व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जाएगा। इस साल 5 मार्च से 10वीं और 12वीं की परीक्षा शुरू हो रही हैं। सीबीएसई ने सर्कुलर जारी कर टाइप-1 डायबिटीज बच्‍चों को कहा है कि अगर वे परीक्षा के दौरान विशेष छूट चाहते हैं तो उन्हें शारीरिक विकलांगता कैटिगरी में फॉर्म भरना होगा। पिछले साल, हालांकि, बोर्ड ने इंसुलिन पर निर्भर कक्षा 10 एवं 12 के छात्रों को परीक्षा कक्ष के अंदर मीठी गोलियां, चॉकलेट, कैंडीज और पानी की बोतल लेकर जाने की अनुमति दी थी। एक मानक शब्दकोश की परिभाषा के अनुसार, डिसएबिलिटी या विकलांगता एक शारीरिक या मानसिक स्थिति है, जो किसी व्यक्ति की गतिशीलता, इंद्रियों या गतिविधियों को सीमित करती है।

यह भी पढ़ें: ये हैं मधुमेह के लक्ष्ण, जिन्हें अनदेखा करना जीवन पर भारी पड़ सकता है

विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2017 के तहत जो 21 विकलांगताएं सूचीबद्ध हैं, उनमें मधुमेह शामिल नहीं है। विकलांगता शब्द मधुमेह की आधुनिक देखभाल की फिलॉसफी में भी फिट नहीं बैठता है, क्योंकि उसमें तो आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्रोत्साहित किया जाता है। टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों के लिए पर्सन विथ डिसेबिलिटी का प्रयोग करना अनुचित है।

इस विषय पर अपनी राय व्यक्त करते हुए डॉ. संजय कालड़ा, कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, भारती हॉस्पिटल करनाल ने कहा, “टाइप-1 डायबिटीज (टी1डीएम) एक डिसएबिलिटी नहीं है। हालांकि, अनियंत्रित या खराब तरह से प्रबंधित टी1डीएम निश्चित रूप से एक डिसएबिलिटी है। टी1डीएम का प्रबंधन जीवनशैली के सभी क्षेत्रों में अत्यधिक आत्मअनुशासन पर जोर देता है, जिसमें भोजन के पैटर्न शामिल हैं। आदर्श रूप से, डायबिटीज पीड़ित बच्चों को 3 प्लस 3 भोजन की सलाह दी जाती है, यानी तीन बार भोजन और तीन बार नाश्ता। लंबे समय तक बिना भोजन के रहने पर न्यूरोग्लाइकोपेनिआ (मस्तिष्क में ग्लूकोज की कमी) हो सकता है और इससे बच्चे की मानसिक सक्रियता कम हो सकती है। कम वजन वाले बच्चों में यह समस्या और अधिक हो सकती है, क्योंकि उनमें ग्लूकोज का भंडारण पहले ही कम होता है। इसलिए, हम परीक्षा के दौरान शक्कर या भोजन लेने के प्रावधान का समर्थन करते हैं।”

यह भी पढ़ें: इंजेक्शन से ड्रग्स लेने वाले लोगों में एचआईवी संक्रमण का जोखिम ज्यादा

डॉ. कालड़ा ने आगे कहा, “टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों के लिए विकलांगता शब्द ठीक नहीं है।डायबिटीज वाले बच्चे कई चुनौतियों का सामना करते हैं और उनकी जरूरतें अलग होती हैं। उनके परिजनों को भी बच्चों में आत्मसम्मान की भावना बनाये रखने के लिए कई तरह से काफी मशक्कत करनी पड़ती है। मेरी राय में, न सिर्फ डायबिटीज, बल्कि किसी भी तरह की विकलांगता से प्रभावित बच्चों के लिए ‘चिल्ड्रन विद डेटरमिनिशन’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए।”

मधुमेह के साथ जीवित रहना किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए एक चुनौती है, लेकिन छोटे बच्चों और किशोरों को अक्सर ऐसी स्थिति से निपटने में कुछ अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परंतु यह एक ऐसी चुनौती है जिसे संकल्प से दूर किया जा सकता है। मधुमेह वाले बच्चों को सामान्य शारीरिक मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास प्रदान किया जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए माता-ंपिता और बच्चों को ब्लड ग्लुकोज के लेवल को यथासंभव सामान्य रखने की कोशिश करनी चाहिए। सामान्य तौर पर टाइप-1 डायबिटीज वाले बच्चों को यह याद रखना चाहिए कि मधुमेह का पता लगना किसी भी तरह से यह संकेत नहीं करता है कि सामान्य जीवन का अंत हो गया।

 

Web Title:CBSE announced that Students with Type1 Diabetes will now be placed under the category of persons with disabilities

Tags: #Type1 Diabetes #CBSE #Board Exams #Type1 Diabetes Precautions

संबंधित खबरें