क्या चीन को रोक सकेगी नरेंद्र मोदी की एक्ट ईस्ट पॉलिसी?

Narendra Modi Act East Policy

आसियान अर्थात दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के समूह से सम्बद्ध सभी दस राष्ट्राध्यक्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश में पधार चुके हैं। आज भारत-आसियान रिश्तों की रजत जयंती का वर्ष है इसलिए यह अवसर और भी ख़ास बन जाता है। इस समूह के सदस्य थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस मलेशिया, सिंगापुर, म्यंमार, कम्बोडिया, लाओस और ब्रूनेई जैसे विकासशील देश है। इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड ने मिलकर 1967 में आसियान का गठन किया था, अन्य देश इसमें बाद में जुड़े। हालाँकि जापान इस समूह का कभी सदस्य नहीं रहा लेकिन चीन के साथ दक्षिण चीन सागर से जुड़े विवादों के कारण उसके लिए इस क्षेत्र का भू-राजनीतिक महत्व रहा है।

यूँ तो दक्षिण चीन सागर भारत के लिया महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है लेकिन आसियान देशों की चीन पर बढ़ती व्यापारिक निर्भरता अमेरिका समेत अन्य विकसित राष्ट्रों के साथ भी भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। हाल के कुछ वर्षों में चीन के बेल्ट इन रोड इनिशिएटिव के बाद इस क्षेत्र में भारत की अधिक सक्रियता की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जिसके कारण भारत सरकार ने एक्ट ईस्ट नामक नीति की शुरुआत की जो व्यापार, संपर्क और संस्कृति के त्रिआयामों को आगे बढाती है।

ऐतिहासिक रूप से इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि दो हज़ार वर्ष पहले से भारत के साथ कम्बोडिया, मलेशिया और थाईलैंड के व्यापारिक सबंध रहे हैं। आसियान-भारत व्यापार 1993 के 2.9 अरब डॉलर था जो 2016 में 58.4 अरब डॉलर पहुंच चुका है गौरतलब है कि आसियान-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी एआइएफटीए समझौता इसे बढ़ाने में एक अहम् कड़ी रही है। भारत सरकार को इसे 2020 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखना चाहिए। आसियान के विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी महज 2.6 प्रतिशत है और चीन की 15 प्रतिशत के आस-पास भारत की ओर से इसे बढ़ाये जाने के प्रयास आवश्यक हैं। संभावित उपायों में रक्षा सम्बन्धी तकनीक बेचना, अमरावती स्मार्ट सिटी निर्माण में सिगापुर का सहयोग, जमीनी-समुद्री मार्ग से इन देशों को जोड़ना, भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाइवे समयबद्ध तरीके से विकास करना प्रमुख है।

सांस्कृतिक रूप से देखा जाय तो इंडोनेशिया, म्यांमार, थाईलैंड, कम्बोडिया समेत दक्षिणपूर्व एशिया के अन्य देशों में रामायण का ख़ास महत्व रहा है, इन देशों में अपनी-अपनी शैली में रामकथा का मंचन होता रहा है जो यह परिभाषित है कि भारत से इन देशों का सांस्कृतिक प्रगाढ़ता रही है, एक तथ्य यह भी है कि इंडोनेशिया एक मुस्लिम बहुल देश होने के बाद भी भारत की सांस्कृतिक विरासतों को आज भी संजोये हुए है और ये उनकी जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है, साथ ही बौद्ध धर्म से संबधित कलाकृतियां, मंदिर भी इस क्षेत्र में पाए गए हैं।

आसियान और भारत की करीब 180 करोड़ की जनसंख्या दुनिया की एक चौथाई आबादी है इसके बीच संवाद को आगे बढ़ाना, विद्यार्थियों के विनिमय के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना, दिल्ली डायलॉग जैसे आयोजनों को अवधारणा को आगे बढ़ाना चाहिए, इसमें दोनों तरफ से टूरिज़्म को संवर्धित करने के लिए एक-दूसरों के महत्वपूर्ण स्थलों का महत्त्व प्रदर्शित करना व आवागमन के नियमों को आसान करना शामिल है। कुल मिलाकर आसियान क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत की मुखरता आवश्यक है, क्योंकि आसियान देश अभी ये परख रहें हैं कि चीन के समुद्री आधिपत्यों और दावों पर भारत का रुख कैसा रहेगा और यही नीति भारत-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता, शांति और व्यापारिक हितों को भविष्य में नए आयाम देगी।

 

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