‘पनडुब्बी’ घोटाला सहित कई बड़े घोटालों में घसीटा गया अमिताभ बच्चन का नाम

फ़िल्मी संघर्ष, फ़िल्मी सफर, फ़िल्मी सफलता, और फ़िल्मी आयाम बनाने के बीच अमिताभ बच्चन राजनीति में भी एक बार अपना भाग्य आजम चुके थे पर 3 सालों के अंदर ही उन्होंने रजनीति को त्याग दिया। अमिताभ ने कहा “मैं भावनाओं में बहकर राजनीति में आया था, पर मैं जल्दी ही समझ गया सरकारी मुद्दों में भटकना गलत था।”

Amitabh Bachchan's name was dragged in several big scandals including the 'submarine' scam

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों से हर किसी के दिल पर छाप छोड़ चुके थे पर राजनीति एक ऐसी चीज़ थी जहाँ वो छाप छोड़ने में चूक रहे थे। ऐसे में सन 1984 की एक घटना जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, उस वक़्त राजीव गांधी एक ऐसी विश्वस्त पार्टी बनाना चाह रहे थे जिसको जनता ना की वोट दे बल्कि पूरा विश्वास भी दिखाए ऐसे में उन्होंने अमिताभ बच्चन जी से राजनीति में आने का प्रस्ताव दिया जिसको अमिताभ जी ने स्वीकार भी कर लिया। हालाँकि अमिताभ जी अब भी इस बात को मानते है कि उनका राजनीति में आना भावुकतावश ही हुआ।

8वीं लोकसभा के चुनाव में उनको इलाहाबाद की जिम्मेदारी दी गयी ये हुआ इसलिए क्योंकी अमिताभ जी स्वयं भी इलाहबाद से ताल्लुक रखते हैं। उस वक़्त भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले ‘हेमवती नंदन बहुगुणा’ को अमिताभ जी से 68.2 फीसदी वोट के बड़े अंतर से मात मिली। अमिताभ जी अपनी राजनितिक जीत से बहुत खुश हुए क्योंकि अब वो हीरो के साथ नेता भी बन चुके थे। उन्होंने फिल्में एवं राजनीति दोनों को साथ साथ करने का फैसला लिया। इसी दौर में उनकी कई फिल्में भी रिलीज़ हुई जिसमें से एक फिल्म ‘मर्द’ ने अच्छा बिजनेस किया। फिल्में भी चल निकली तो व्यस्तता भी बढ़ती गई इस कारण अमिताभ बच्चन कहीं ना कहीं राजनीति से दूर होते भी जा रहे थे। जिससे उनकी विरोधी पार्टियों को फायदा मिला और इसका इस्तेमाल भी जोरशोर तरीके से किया गया। ‘बोफोर्स’ ‘फेयरफैक्स’ और ‘पनडुब्बी’ घोटाला में अमिताभ का नाम घसीटा जाने लगा। नाम का इस्तेमाल और राजनितिक दबाव अमिताभ जी जब नहीं झेल पाये तो अंत में उन्होंने राजनीति से सन्यास लेने का फैसला कर लिया। बच्चन साहब आज भी मानते हैं कि फिल्मों के डायलॉग और राजनितिक वादे दो अलग अलग चीज़े हैं और राजनीति में चुनाव के समय जो हम वादे करते हैं उनको पूरा करने की जिम्मेदारी भी रखनी चाहिए। जो शायद मैं नहीं कर पाया मुझे इसका मलाल हमेशा रहेगा।

फ़िल्मी सफर में हालाँकि बच्चन जी ने काफी तरह के रोल किये हैं पर राजनितिक मुद्दों पर बनी फिल्मों पर अमिताभ जी की अलग ही छाप रही। सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने वाली फिल्में बनाने वाले निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ के बाद फिल्म ‘सत्याग्रह’ में अमिताभ जी मुख्य भूमिका में दिखाई दिए थे। प्रकाश झा की माने तो यह फिल्म गांधी के नहीं, बल्कि आज के सत्याग्रह को दिखने की कोशिश है। सत्याग्रह ‘अन्ना-आंदोलन’ पर आधारित थी और इसलिए ये कयास भी लगाया गया कि इस फिल्म में अन्ना का किरदार अमिताभ द्वारा पर्दे पर उकेरा गया था।

वर्ष 2005 में आई फिल्म ‘सरकार’ में भी अमिताभ जी राजनीति से जुड़ा किरदार निभाते नजर आये थे।मारियो पूजो के चर्चित उपन्यास ‘द गॉडफादर’ से प्रेरित रामगोपाल वर्मा की फिल्म थी सरकार। जिसमें अमिताभ मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म के बारे में कहा जा रहा था कि अमिताभ इस फिल्म में जिस मुख्य किरदार की भूमिका निभा रहे थे उसमे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की छवि साफ़ दिखाई दे रही थी। उसी तरह के कपड़े और गले में रुद्राक्ष की माला और नाम की समानता भी काफी हद तक थी। बाल ठाकरे और फिल्म में किरदार का नाम सुभाष नागरे।

इसके बाद अमिताभ ने सरकार फिल्म की सीक्वल भी की- सरकार राज और सरकार-3। अमिताभ जी राजनीति से जुड़ी कितने और फिल्में करेंगे ये तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा। हाल फिलहाल हम उनके 75वें जन्मदिन पर स्वस्थ्य जीवन की शुभकामनाएं देते हुए ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि सदी का महानायक ऐसे ही प्रगति के शिखर पर विराजमान रहे।

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